विवाह (#14344)

वह दाता और उदार है!
	स्तुति हो ईश्वर की, जो पुरातन, चिरन्तन, निर्विकार, शाश्वत है। वह जो स्वयं अपने अस्तित्व का साक्षी है कि वह सत्य ही एकाकी, एकल, अबाधित, उदात्त है। हम साक्षी हैं कि उसके अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है, हम उसकी एकमेवता को स्वीकारते हैं, उसकी अखण्डता पर विश्वास करते हैं। उसने सदैव ही अगम्य उच्च शिखरों पर निवास किया है, वह स्वयं के अतिरिक्त किसी के भी उल्लेख से पवित्र तथा स्वयं के अतिरिक्त अन्य किसी के भी वर्णन से परे है।
और जब उसने मनुष्यों पर कृपा और उपकार व्यक्त करने और संसार को सुव्यवस्थित करने की इच्छा की, उसने प्रथाओं को प्रकट किया और विधानों की रचना की, उसने उसमें विवाह के विधान की स्थापना की और इसे कल्याण और मुक्ति के दुर्ग के रूप में बनाया और जो परम पावन पुस्तक में पवित्रता के आकाश से उतरा था उसका हमें आदेश दिया। वह कहता है, उसकी महिमा महान है! हे लोगो! “विवाह के बन्धन में बंधो ताकि तुम उसे जन्म दे सको जो मेरे सेवकों के बीच मेरा उल्लेख करेगा। यह तुम्हारे लिए मेरा आदेश है, अपनी सहायता के रूप में दृढ़ता से इसको थाम लो।

-Bahá'u'lláh
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विवाह (#8384)

”बहाई विवाह दो पक्षों के बीच मृदुल मिलन और स्नेहपूर्ण सम्बन्ध है, लेकिन उन्हें अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिये और एक दूसरे के चरित्र से सुपरिचित हो जाना चाहिये। एक सुदृढ़ संविदा द्वारा यह चिरंतन बंधन संरक्षित कर लिया जाना चाहिये और उद्देश्य होना चाहिये मधुर सम्बन्ध, साहचर्य और एकता तथा अनन्त जीवन को प्राप्त करना।“ 
”...एक विवाहित जोड़े का जीवन आसमान के फरिश्तों की भाँति होना चाहिये - ख़ुशियों से भरा और आध्यात्मिक आनन्द से परिपूर्ण, एकता का प्रतीक और मित्रवत् - मानसिक और दैहिक मित्रता...। उनके मत और विचार सत्य के सूर्य की किरणों के समान और आसमान के चमकते सितारों की प्रखरता लिये हों। सहभागिता और समरसता के वृक्ष की टहनियों पर मधुर गान गुंजित करते पक्षियों की भाँति उनका जीवन हो। उन्हें निरन्तर आनन्द से उल्लसित होना चाहिये और दूसरों के हृदयों को प्रसन्नता देने का साधन बनना चाहिये। उन्हें अपने संगी साथियों के समक्ष एक उदाहरण बनना चाहिये, एक-दूसरे के प्रति सच्चा प्रेम और वफ़ादारी रखनी चाहिये और अपने बच्चों को कुछ इस प्रकार शिक्षित करना चाहिये कि वे अपने परिवार का नाम रौशन करें।“ 
 
विवाह की प्रतिज्ञा परम पावन पुस्तक ”किताब-ए-अक़दस“ में वर्णित वह श्लोक है जो वर और वधू द्वारा बारी-बारी से वैसे दो गवाहों की उपस्थिति में पढ़ी जानी चाहिये जो आध्यात्मिक सभा को स्वीकार्य हों। विवाह की प्रतिज्ञा इस प्रकार है:
”हम, सत्य ही, ईश्वर की इच्छा का अनुपालन करेंगे।“

-`Abdu'l-Bahá
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विवाह (#8385)

महिमा हो तेरी, हे मेरे ईश्वर! सत्य ही, तेरा यह सेवक और तेरी यह सेविका तेरी दया की छत्रछाया में एकत्रित हुए हैं और तेरी कृपा और तेरी उदारता के प्रताप से एकता के सूत्र में बंधे हैं। हे स्वामी! अपने इहलोक और अपने साम्राज्य में इनकी सहायता कर और अपनी उदारता, कृपा द्वारा उनके लिये प्रत्येक शुभ का विधान कर। हे स्वामी, इन्हें अपने दासता में सुदृढ़ बना और अपनी सेवा में उनकी सहायता कर। अपने लोक में उन्हें अपने नाम के प्रतीक चिन्ह होने दें और अपने प्रदानों के द्वारा उनकी सुरक्षा कर जो इस लोक और आगामी लोक में अनन्त हैं। हे स्वामी, वे तेरी दयालुता के साम्राज्य से याचना कर रहे हैं और तेरी एकमेवता के लोक का आह्वान कर रहे हैं। सत्य ही, उन्होंने तेरे आदेश के पालन हेतु विवाह किया है। जब तक समय का अस्तित्व है, उन्हें एकता और सामंजस्य के प्रतीक बना। सत्य ही, तू सर्वशक्तिशाली, सर्वव्यापी और सर्वसामर्थ्‍यवान है।

-`Abdu'l-Bahá
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विवाह (#8386)

वह ईश्वर है! अद्वितीय स्वामी है! 
अपने शक्तिसम्पन्न विवेक से तूने मानवजाति के लिये विवाह का विधान किया है कि इस लोक में एक के बाद एक मानव पीढ़ियाँ बनी रहें और जब तक इस लोक का अस्तित्व है तब तक तेरी एकमेवता की पावन देहरी पर तेरी सेवा और उपासना, तेरी स्तुति और महिमागान में वे स्वयं को व्यस्त रखें। ”मैंने आत्माओं और मनुष्यों की सृष्टि नहीं की है बल्कि अपने उपासक सृजित किये हैं“। अतः हे ईश्वर! तू अपने प्रेम के घौंसले में इन दो पक्षियों का विवाह अपनी दया के स्वर्ग में सम्पन्न कर और इन्हें अनन्त कृपा को आकर्षित करने का साधन बना जिससे प्रेम के इन दो ”सागरों“ के मिलन से कोमलता की एक लहर उमड़ सके और जीवन के तट पर ये पावनता और श्रेष्ठता के मोती बिखेर सकें। ”उसने दो सागरों को उन्मुक्त कर दिया है ताकि वे एक दूसरे से मिल सकें: उनके बीच एक मर्यादा है जिसका वे उल्लंघन न करें। अब अपने स्वामी की कृपा के सागरों में से तू किसको अस्वीकार करेगा? प्रत्येक से वह महानतर और लघुतर मोती उत्पन्न करता है।“
हे तू कृपालु स्वामी! इस विवाह को तू मूंगे और मोती उत्पन्न करने का साधन बना। तू सत्य ही सर्वशक्तिशाली, सर्वमहान और सदा क्षमाशील है।

-`Abdu'l-Bahá
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विवाह (#8387)

हे मेरे ईश्वर! हे मेरे ईश्वर! ये दो उज्ज्वल नक्षत्र तेरे प्रेम के कारण परिणय सूत्र में बंधे हैं, तेरी पावन देहरी की सेवा के लिये एक हुए हैं, तेरे धर्म के कार्यों के निमित्त एकाकार बने हैं। हे मेरे स्वामी, सर्वकृपालु ईश्वर! तू इस विवाह को अपनी असीम अनुकम्पा का प्रकाश-सूत्र बना दे, हे कल्याणकर्ता, हे दाता! इन्हें अपने वरदानों की ऐसी जगमगाती किरण बना दे कि इस महान वृक्ष से ऐसी शाखाएँ फूटें जो तेरे उपहारों की वर्षा में विकास करें।
सत्य ही तू उदार, सर्वशक्तिशाली, दयालु, सर्वकृपालु है!

-`Abdu'l-Bahá
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