कोष (#8309)

ईश्वर के समस्त मित्रों को...यथासम्भव दान देना चाहिये, उनके द्वारा समर्पित राशि, चाहे कितनी भी अल्प क्यों न हो। ईश्वर किसी भी आत्मा पर उसकी क्षमता से अधिक भार नहीं डालता। ऐसे दान सभी केन्द्रों एवं समस्त अनुयायियों से आने चाहिये...”हे ईश्वर के मित्रों ! तुम आश्वस्त रहो कि इन योगदानों के बदले तुम्हारी खेती-बाड़ी, तुम्हारे उद्योग और व्यापार को सुंदर उपहारों और दानों का कई गुना आशीर्वाद प्राप्त होगा। निःसंदेह जो सद्कर्म करता है, पुरस्कार में वह दस गुना प्राप्त करेगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि जीवंत स्वामी उन्हें अत्यधिक सम्पुष्टि प्रदान करता है, जो उसके पथ में अपनी सम्पदा व्यय करते हैं।“

-`Abdu'l-Bahá
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कोष (#8308)

हे ईश्वर, मेरे ईश्वर! अपने सच्चे प्रेमियों के मस्तक को तेजवान बना और निश्चित विजय के देवदूतों के समूहों से उन्हें सहारा दे। अपने सीधे पथ पर उनके पगों को अडिग बना दे, और अपनी पुरातन उदारता से उनके समक्ष अपने आशीषों के द्वार खोल दे, क्योंकि जो कुछ तूने उन्हें प्रदान किया है, वे तेरे मार्ग में व्यय करते हैं, तेरे धर्म की रक्षा करते हैं, तेरे स्मरण में विश्वास रखते हैं, तेरे प्रेम के निमित्त अपने हृदयों को अप्रित करते हैं, और जो कुछ उनके पास है, उसे वे तेरे सौंदर्य की आराधना और तुझे प्रसन्न करने की विधियों की खोज में देने से इन्कार नहीं करते।
हे मेरे स्वामी! उनके लिए एक प्रचुर अंश, एक नियत पुरस्कार और निश्चित पारितोषिक का विधान कर।
वस्तुतः तू ही पालनहार, सहायक, अतिशय दाता, उदार, प्रदात-प्रदाता है।

-`Abdu'l-Bahá
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