उपवास (#8753)

स्तुति हो तेरी, हे स्वामी मेरे ईश्वर! मै तुझसे इस प्रकटीकरण के माध्यम से याचना करता हूँ जिससे अंधकार प्रकाश में परिवर्तित हो गया है, जिसके माध्यम से बार-बार उपासना स्थल का निर्माण हुआ है और लिखित पाती प्रकट की गई है, और वह विस्तारित नामावली अनावृत हुई है, मैं तुझसे याचना करता हूँ कि मुझे और उन्हें, जो मेरे संगी हैं, वह प्रदान कर जो हमें तेरी सर्वातीत महिमा के आकाश में ऊँचे विचरण करने में समर्थ बनाये और हमें ऐसे सन्देहों के कलुष से मुक्त कर दे जिन्होंने शंकाशील लोगों को तेरी एकता की छत्रछाया में आने से रोका है।
मैं वह हूँ, हे मेरे ईश्वर, जिसने तेरी स्नेहमयी उदारता की डोर को दृढ़ता से थाम लिया है और तेरी दया और तेरी अनुकम्पा के आंचल से बंधा हुआ है। तू मेरे लिये और मेरे प्रियजनों के लिये इहलोक और परलोक के शुभ-मंगल का विधान कर और तब उन्हें वह गुप्त उपहार प्रदान कर जिसका विधान तूने अपने सबसे चुने हुए जनों के लिये किया है।
ये वे दिन हैं, हे मेरे ईश्वर, जिसमें तूने अपने सेवकों को उपवास धारण करने का आदेश दिया है। वह धन्य हैं जो मात्र तेरे लिये और तेरे अतिरिक्त अन्य समस्त वस्तुओं से पूर्णतया अनासक्त होकर, उपवास धारण करता है। हे मेरे ईश्वर! मेरी सहायता कर और उन्हें भी सहायता दे, कि हम सब तेरी आज्ञा का पालन करें और तेरी शिक्षाओं पर चलें। सत्य ही तू अपनी इच्छानुसार सब कुछ करने में समर्थ है।
तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं। तू सर्वज्ञाता, सर्वप्रज्ञ है। स्तुति हो ईश्वर की, अखिल लोकों के ईश्वर की।

-Bahá'u'lláh
-----------------------

उपवास (#8752)

परम पावन पुस्तक ”किताब-ए-अक़दस“ में लिखा  है:
*”हमने प्रौढ़ता (15 वर्ष की आयु) प्राप्त करने के प्रारम्भ से ही तुम्हें प्रार्थना एवं उपवास रखने का आदेश दिया है। यह ईश्वर द्वारा निर्धारित विधान है, जो तुम्हारा और तुम्हारे पूर्वजों का स्वामी है। इस दायित्व से उसने उन्हें मुक्त किया है जो बीमार या अधिक आयु के कारण अशक्त हैं।.....यात्रा करने वाले, बीमार तथा वे महिलाएँ जो बच्चों के साथ हैं या स्तनपान कराती हैं उन्हें अपनी करुणा के संकेतस्वरूप ईश्वर ने इस नियम से मुक्त रखा  है।....सूर्योदय से सूर्यास्त तक खान-पान से परहेज कर और सावधान रह कि तेरी वासना इस पुस्तक में निर्दिष्ट इस कृपा से तुझे वंचित न कर दे।“
 
मैं तुझसे याचना करता हूँ, हे मेरे ईश्वर, तेरे समर्थ चिन्ह के नाम से और मानवों के मध्य तेरे अनुग्रह के प्रकटीकरण के नाम से कि मुझे अपनी निकटता के नगर द्वार से दूर न हटा। तेरे प्राणियों के मध्य व्याप्त तेरी कृपा की जो मैंने आशा की है, उसे निराशा में न बदल। हे मेरे ईश्वर! तू देखता है कि मैं तेरे पवित्रतम, प्रकाशोत्तम्, शक्तिशाली, महानतम्, उच्चतम्, भव्यतम् नाम का स्मरण करता रहता हूँ और तेरे उस परिधान के आंचल की छोर से बंधा हूँ, जिससे इहलोक और परलोक में सभी बंधे हैं।
मैं तुझसे याचना करता हूँ, हे ईश्वर, तेरी मधुर वाणी और तेरे महान शब्द के नाम से कि मुझे निरंतर अपनी देहरी के निकट ला और मुझे अपनी दया की छाया और अपनी उदारता के चंदोवे से दूर न हटा। हे ईश्वर! तू देखता है कि मैं तेरे पवित्रतम्, प्रकाशोत्तम्, शक्तिशाली, महानतम्, उच्चतम्, भव्यतम् नाम का स्मरण करता रहता हूँ और तेरे उस परिधान के आंचल की छोर से बंधा हूँ, जिससे इस इहलोक और परलोक में सभी बंधे हैं।
मैं तुझसे याचना करता हूँ, हे मेरे ईश्वर, तेरे  तेजोमय भाल की प्रभा और तेरे मुखड़े की उस ज्योति की उज्ज्वलता के नाम से जो उस सर्वोच्च क्षितिज से आलोकित होती है कि मुझे अपने परिधान की सुरभि से आकर्षित कर और मुझे अपनी वाणी की दिव्य मदिरा का पान करा। हे ईश्वर! तू देखता है कि मैं तेरे पवित्रतम्, प्रकाशोत्तम्, शक्तिशाली, महानतम्, उच्चतम्, भव्यतम् नाम का स्मरण करता रहता हूँ और तेरे उस परिधान के आंचल की छोर से बंधा हूँ, जिससे इहलोक और परलोक में सभी बंधे हैं।
मैं तुझसे याचना करता हूँ, हे मेरे ईश्वर, तेरे उन केशों के नाम से जो तेरी सृष्टि के साम्राज्य में गूढ़ अर्थों की कस्तूरी सुगंध फैलाते हुए तेरे मुखमंडल पर उस समय लहराते हैं जब तेरी यशस्वी तूलिका तेरी पातियों के पृष्ठों पर गतिशील होती है, कि मुझे तेरे धर्म की सेवा करने के लिये ऐसी शक्ति दे कि मैं पीछे न हटूँ और न ही उनके संकेतों से बाधित हो पाऊँ जो तेरे चिन्हों को अस्वीकार कर चुके हैं और तेरे मुखड़े से विमुख हो गये हैं। हे ईश्वर! तू देखता है कि मैं तेरे पवित्रतम्, प्रकाशोत्तम्, शक्तिशाली, महानतम्, उच्चतम्, भव्यतम् नाम का स्मरण करता रहता हूँ और तेरे उस परिधान के आंचल की छोर से बंधा हूँ, जिससे इहलोक और परलोक में सभी बंधे हैं।
मै तुझसे याचना करता हूँ, हे मेरे ईश्वर, तेरे  नाम से, जिसे तूने नामों का सम्राट बनाया है, जिसके द्वारा वे सब, जो आकाश में हैं और वे सब, जो इस धरती पर हैं, आनन्द विभोर हो गये हैं, कि मुझे अपने सौन्दर्य के सूर्य के दर्शन के योग्य बना और मुझे अपनी वाणी की दिव्य मदिरा का पान करा। हे ईश्वर! तू देखता है कि मैं तेरे पवित्रतम्, प्रकाशोत्तम्, शक्तिशाली, महानतम्, उच्चतम्, भव्यतम् नाम का स्मरण करता रहता हूँ और तेरे उस परिधान के आंचल की छोर से बंधा हूँ, जिससे इहलोक और परलोक में सभी बंधे हैं।
मैं तुझसे याचना करता हूँ, हे मेरे ईश्वर, उच्चतम् शिखर पर बने हुए तेरी भव्यता के वितान के नाम से, और सर्वोच्च पर्वत पर तेरे धर्मप्रकाशन के चंदोवे के नाम से, कि मुझे अनुग्रहपूर्वक वह करने में सहायता दे, जो तेरी इच्छा है और जिसे तेरे उद्देश्य ने प्रकट किया है। हे ईश्वर! तू देखता है कि मैं तेरे पवित्रतम्, प्रकाशोत्तम्, शक्तिशाली, महानतम्, उच्चतम्, भव्यतम् नाम का स्मरण करता रहता हूँ और तेरे उस परिधान के आंचल की छोर से बंधा हूँ, जिससे इहलोक और परलोक में सभी बंधे हैं।
मैं तुझसे याचना करता हूँ, हे मेरे ईश्वर! अपने अनन्त सौन्दर्य के नाम से ऐसा वर दे कि मैं उन सबके प्रति मृतप्राय हो जाऊँ जो मेरा है और सदा-सर्वदा उसके प्रति जीवित रहूँ जो तेरा है। वह चिरस्थायी सौन्दर्य है, जिसके प्रकट होते ही सौन्दर्य का साम्राज्य भी आराधना में विनत हो यशोगान करने लगा है। हे ईश्वर! तू देखता है कि मैं तेरे पवित्रतम्, प्रकाशोत्तम्, शक्तिशाली, महानतम्, उच्चतम्, भव्यतम् नाम का स्मरण करता रहता हूँ और तेरे उस परिधान के आंचल की छोर से बंधा हूँ, जिससे इहलोक और परलोक में सभी बंधे हैं।
मैं तुझसे याचना करता हूँ, हे मेरे ईश्वर! तेरे उस परमप्रिय नाम के प्रकटीकरण के माध्यम से जिसने प्रेमियों के हृदय को दग्ध कर दिया है और जिसका यशोगान करने के लिये धरती के समस्त निवासी उठ खड़े हुए हैं। मेरी सहायता कर कि मैं तेरी सृष्टि में, तेरे जनों के मध्य, तेरा स्मरण कर सकूँ। हे ईश्वर! तू देखता है कि मैं तेरे पवित्रतम्, प्रकाशोत्तम्, शक्तिशाली, महानतम्, उच्चतम्, भव्यतम् नाम का स्मरण करता रहता हूँ और तेरे उस परिधान के आंचल की छोर से बंधा हूँ, जिससे इहलोक और परलोक में सभी बंधे हैं।
मैं तुझसे याचना करता हूं, हे मेरे ईश्वर ! तेरे नामों के साम्राज्य में तेरी वाणी के पवन झकोरों के कारण दिव्य वृक्ष में होने वाले स्पंदन के नाम से कि मुझे उन सबसे दूर, बहुत दूर कर दे जिनसे तू दूर रहता है और मुझे उस बिन्दु तक ले चल, जहाँ तेरे संकेतों का अरुणोदय हुआ है। हे ईश्वर! तू देखता है कि मैं तेरे पवित्रतम्, प्रकाशोत्तम्, शक्तिशाली, महानतम्, उच्चतम्, भव्यतम् नाम का स्मरण करता रहता हूँ और तेरे उस परिधान के आंचल की छोर से बंधा हूँ, जिससे इहलोक और परलोक में सभी बंधे हैं।
मैं तुझसे याचना करता हूँ, हे मेरे ईश्वर! उस पावन अक्षर के नाम से, जिसके उच्चरित होते ही महासागर उमड़ पड़े, पवन प्रवाहमान हुआ, सुफल सामने आये, वृक्षों को बसंत का वैभव मिला, अतीत के धूंध छंट गये, समस्त आवरण हट गये और तेरे भक्तगण अपने अप्रतिबंधित स्वामी के मुखारबिंदु के प्रकाश की ओर बढ़ चले, कि अपने ज्ञान के खज़ाने और विवेक के पात्र से मुझे वह ज्ञान दे जो अब तक छिपा हुआ था। हे ईश्वर! तू देखता है कि मैं तेरे पवित्रतम्, प्रकाशोत्तम्, शक्तिशाली, महानतम्, उच्चतम्, भव्यतम् नाम का स्मरण करता रहता हूँ और तेरे उस परिधान के आंचल की छोर से बंधा हूँ, जिससे इहलोक और परलोक में सभी बंधे हैं।
मैं तुझसे याचना करता हूँ, हे मेरे ईश्वर! तेरे प्रेम की उस अग्नि के नाम से, जिसने तेरे चुने हुए जनो और प्रियजनों की आँखों से नींद चुरा ली है और मैं इस प्रभात के नाम से तुझसे याचना करता हूँ कि मुझे उनमें गिन, जिन्होंने तेरे द्वारा भेजे गये ग्रंथ में तेरी इच्छा से प्रकट हुए को पा लिया है। हे ईश्वर! तू देखता है कि मैं तेरे पवित्रतम्, प्रकाशोत्तम्, शक्तिशाली, महानतम्, उच्चतम्, भव्यतम् नाम का स्मरण करता रहता हूँ और तेरे उस परिधान के आंचल की छोर से बंधा हूँ, जिससे इहलोक और परलोक में सभी बंधे हैं।
मैं तुझसे याचना करता हूँ, हे मेरे ईश्वर, तेरे  मुखमंडल के प्रकाश के माध्यम से, जिसने तेरे भक्तजनों को तेरे विधानों के अनुपालन के लिये प्रेरित किया है और उन समर्पित लोगों के माध्यम से जिन्होंने तेरी राह पर चलते हुए तेरे शत्रुओं के प्रहारों का सामना किया, कि अपनी महान तूलिका से मेरे लिये उसका विधान कर जो तूने अपने विश्वासपात्र और चुने हुए लोगों के लिये किया है। हे ईश्वर! तू देखता है कि मैं तेरे पवित्रतम्, प्रकाशोत्तम्, शक्तिशाली, महानतम्, उच्चतम्, भव्यतम् नाम का स्मरण करता रहता हूँ और तेरे उस परिधान के आंचल की छोर से बंधा हूँ, जिससे इहलोक और परलोक में सभी बंधे हैं।
मैं तुझसे याचना करता हूँ, हे मेरे ईश्वर, तेरे  नाम से जिसके माध्यम से तूने जो तेरे अभिलाषी हैं अपने प्रेमियों की पुकार सुनी है। जिनके माध्यम से तूने उनकी आहें सुनी हैं और जो तेरी निकटता पाना चाहते हैं, जिसके माध्यम से तूने उनकी अर्न्‍ततम की पुकार सुनी है और जिनकी आशा-आकांक्षा तुझसे ही जुड़ी हैं, जिनके माध्यम से तूने उनकी इच्छा पूरी की है; मैं तेरी कृपा और अनुकम्पा के नाम से याचना करता हूँ, जिनके  माध्यम से क्षमाशीलता का महासिन्धु उमड़ा है, जिनके माध्यम से तेरे सेवकों पर तेरी उदारता के मेघ बरसे हैं, कि उन सबके लिये, जो तेरी ओर उन्मुख हुए हैं और जिन्होंने तेरे द्वारा आदेशित उपवास धारण किया है, वह विधान कर, वह पुरस्कार प्रदान कर जो समुचित है। ऐसे लोग तेरे आदेश के बिना नहीं बोलते और तेरे पथ में तेरे प्रेम के लिये अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं।
मैं तुझसे याचना करता हूँ, हे मेरे ईश्वर! तेरे नाम से और तेरे संकेतों के नाम से और तेरे प्रतीकों के नाम से और तेरे सौन्दर्य-सूर्य के जाज्वल्यमान प्रकाश के नाम से और तेरी महान शाखाओं के नाम से कि उनके पापों को क्षमा कर, जिन्होंने तेरे विधानों के अनुकूल उपवास धारण किया है और उसका पालन किया है जो तेरी परम पावन पुस्तक में विहित हैं। हे ईश्वर! तू देखता है कि मैं तेरे पवित्रतम्, प्रकाशोत्तम्, शक्तिशाली, महानतम्, उच्चतम्, भव्यतम् नाम का स्मरण करता रहता हूँ और तेरे उस परिधान के आंचल की छोर से बंधा हूँ, जिससे इहलोक और परलोक में सभी बंधे हैं।

-Bahá'u'lláh
-----------------------

उपवास (#8754)

हे दिव्य विधाता! जिस तरह में दैहिक कामनाओं, अन्न और जल से विरक्त हूँ, वैसे ही मेरे हृदय को भी अपने अतिरिक्त अन्य सब के प्रेम से शुद्ध और निर्मल कर दे। मेरी आत्मा को भ्रष्ट इच्छाओं और भ्रष्ट प्रवृत्तियों से बचा, इसकी रक्षा कर, ताकि मेरी चेतना पवित्रता की श्वांस के साथ संलाप कर सके और तेरे अतिरिक्त अन्य सबका परित्याग कर सके।

-`Abdu'l-Bahá
-----------------------

